October 4, 2022

जपला का खरवार राजवंश व उनके अभिलेखीय साक्ष्य, इस राजवंश का 400 वर्षों तक रहा शासनकाल

सासाराम। रोहतास(बिहार)और पलामू (झारखंड)का खरवार राजवंश मध्यकाल में प्रसिद्ध रहा है। 12 वीं सदी से लेकर 16 वीं सदी तक इस राजवंश ने बिहार के बड़े भूभाग पर अपना राज्य स्थापित किया।इस राजवंश में प्रताप धवल देव ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र की भांति उदयीमान हुए कि उनकी कीर्ति दूर-दूर तक फैल गई। कन्नौज के गहड़वाल शासनकाल में ये पहले नायक हुए फिर महानायक की पदवी प्राप्त की। प्रताप धवल देव ने कई शिलालेखों को लिखवाया है।

इनमें से अधिकांश शिलालेख अंग्रेजी काल में ही खोज लिये गए थे।प्रताप धवल देव का पहला शिलालेख है तुतला भवानी या तुतराही शिलालेख। इसके कुछ अंशों को अंग्रेजी काल में पढ़ा गया था।हालांकि यहां के संपूर्ण शिलालेख अभी तक अपठित हैं।कारण है इनका मंदिर में दब जाना।प्रताप धवल देव का दूसरा शिलालेख है फुलवरिया शिलालेख।इसकी खोज प्रोफेसर किल्हाॅर्न ने की थी, किंतु सुनिश्चित स्थान न बता पाने के कारण इसे गुम मान लिया गया था। फुलवरिया शिलालेख की पुनः खोज हमने वर्ष 2010 में की और इसका पाठ किया था।

वर्ष 2019 में कैमूर पहाड़ी में इनके दो और छोटे शिलालेखों की हमनें खोज की।जपला में भी इनका एक प्रतिमा पर शिलालेख है। जपला में ही इनकी माताजी राल्हा देवी का भी शिलालेख है। इस राजवंश में साहस धवल देव सर्व प्रसिद्ध राजा हुए। उन्होंने महानृपति की उपाधि सर्वप्रथम धारण की। साहस धवल देव, महानायक प्रताप धवल देव के तीसरे पुत्र थे। महाराज साहस धवल देव के पुत्रों-पौत्रों के शिलालेख तथा ताम्रपत्र पहले मिल चुके हैं और उन्हें पढ़ा भी गया है।साहस धवल देव के बड़े पुत्र विक्रम धवल देव के बांदू शिलालेख को हमने खोजा और पढ़ा था। बांदू में ही इनके वंशजों के कई और शिलालेख भी हैं, जिन्हें हमने पढ़ा और प्रकाशित किया जा चुका है।

विक्रम धवल देव का एक ताम्रपत्र पहले मिला है जिसका पाठ और प्रकाशन प्रोफेसर टीपी वर्मा ने किया। इसके अतिरिक्त एक और ताम्रपत्र है जो विक्रम धवल देव द्वितीय का है। इसे प्रोफेसर डॉक्टर देवी प्रसाद दुबे सर ने पढ़ा है। हाल तक महाराज साहस धवल देव का कोई अभिलेख प्राप्त नहीं था। उनका ताम्रपत्र पहली बार अदमापुर,शिवसागर,रोहतास से मिला। यह एक भूमिदान अभिलेख है। इसका हमने पाठ किया। इस राजवंश के अन्य ताम्रपत्र जो प्राप्त है वे उनके वंशजों द्वारा महाराज साहस धवल देव के इस ताम्रपत्र की अगली कड़ी के रूप में हैं। इसका भी प्रकाशन हो चुका है।

इसी राजवंश की अगली कड़ी में रोहतासगढ़ के प्रसिद्ध राजा हरि कृष्ण का उल्लेख समीचीन होगा। राजा हरि कृष्ण से शेरखां ने धोखे से रोहतासगढ़ को हस्तगत किया था। प्रसिद्ध डोली की कहानी मध्यकालीन तमाम संदर्भों में मौजूद है।खरवार राजवंश की प्रसिद्धि अंग्रेजी काल में भी बनी रही। इस राजवंश की शाखाएं सोनपुरा से लेकर रामगढ़ तक फैली हुई हैं,जहां उनके वंशज मौजूद हैं। इस राजवंश का संपूर्ण इतिहास अभी तक सामने नहीं था।लेखक ने बताया कि हमने एक आलेख के माध्यम से इस राजवंश का संपूर्ण इतिहास सामने लाने का प्रयास किया है।

इसका शीर्षक है- ‘रोहतास-जपला का खरवार राजवंश और अभिलेखीय साक्ष्य।’ इस आलेख को इंडियन आर्कियोलॉजिकल सोसायटी (भारतीय पुरातत्त्व परिषद्),नई दिल्ली के शोध जर्नल ‘पुराप्रवाह’ में स्थान प्राप्त हुआ है।उन्होंने इसके लिए सोसाइटी के महासचिव के.एन. दीक्षित सर,संपादक बुद्धरश्मि मणि सर,आशा जोशी मैडम और संपादक मंडल के प्रति आभार व्यक्त किया हैं।

हालांकि इस वंशावली में अभी भी बीच के कुछ राजाओं की कड़ियां टूट रही हैं। ऐसा अंतराल संदर्भों के प्राप्त न होने के कारण हुआ है।आशा है संदर्भ प्राप्त होंगे और यह अंतराल भी समाप्त होगा।फिर भी मुझे यह कहने में संकोच नहीं है कि यह आलेख इस वंशावली के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा किया है। बांदू शिलालेख की खोज में प्रवीण कुमार दुबे,प्रताप धवल देव के दो शिलालेखों की खोज में सिद्धनाथ पांडे, शिलालेखों के अनुवाद में आचार्य मुनमुन दुबे और आचार्य पंडित राम अवधेश चतुर्वेदी ने हमारी मदद की थी। जपला के शिलालेखों का फोटो डॉक्टर अभिषेक कुमार गुप्ता नें हमें उपलब्ध कराया था।

जपला के पत्रकार और शिक्षक अंगद किशोर जी को जपला के शिलालेखों के स्पष्ट फोटो के लिए कष्ट दिया था।इनका आभार हमने अपने शोध पत्र में भी आभार शीर्षक से दिया था जो दुर्भाग्यवश नहीं छप पाया है।इन सभी के प्रति हम आभारी हैं। साथ ही उन्होंने पाठकों से अपील करते हुए कहा कि यह आलेख आपके पास सादर प्रेषित है। कृपया इसे पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया देने का कष्ट करें।कुछ त्रुटियां हो तो भी बताने की कृपा करें ताकि इस वंशावली को शुद्ध किया जा सके।

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