October 4, 2022

बनारस गए और ये 6 जगहें नहीं घूमीं तो क्या फायदा, यादगार बनेगी आपकी यात्रा

वाराणसी: देश की सबसे प्राचीन नगरी के रूप में विख्यात वाराणसी में पर्यटकों को बिल्कुल अनोखा अनुभव मिलता है. बनारस की संकरी गलियों में घूमना हो या फिर घाट किनारे का नजारा, ये सब यादगार पल बन जाते हैं.

हर किसी के जहन में जब भी बनारस, वाराणसी या काशी का नाम आता हैं तो मन में एक निर्मल और पवित्र छवि बन जाती है. यहां गंगा जैसी पवित्र नदी के साथ ही कई जगहें हैं जो आध्यात्म से जुड़ी हुई हैं और अपना पौराणिक महत्व भी रखती हैं. अगर आप भी बनारस की यात्रा कर रहे हैं तो इन जगहों को बिल्कुल भी मिस न करें.

श्री काशी विश्वनाथ मंदिर

अगर आप बनारस घूमने आए हैं और काशी विश्वनाथ मंदिर नहीं गए तो आपका आना व्यर्थ है. काशी में भगवान शिव का भव्य मंदिर गंगा नदी के साथ में स्थित है. यह मंदिर 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है. काशी विश्वनाथ मंदिर का हिन्दू धर्म में एक विशिष्ट स्थान है और यह कई हजारों वर्षो पुराना मंदिर है. एक मान्यता के अनुसार गंगा नदी में स्नान करने और इस मंदिर में भगवान शिव के दर्शन करने से मोक्ष कि प्राप्ति होती है.

अपने इतिहास को पढ़ने से पता चलता है कि अहिल्याबाई होल्कर ने काशी विश्वनाथ मंदिर बनवाया जिस पर पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह ने सोने का छत्र लगवाया. ग्वालियर की महारानी बैजाबाई ने ज्ञानवापी का मंडप बनवाया और महाराजा नेपाल ने वहां विशाल नंदी प्रतिमा स्थापित करवाई.

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जरूर करें गंगा में स्नान

बनारस की सबसे पवित्र और सबसे बड़ी नदी गंगा ही है. बनारस इसी नदी के किनारे बसा हुआ है. यह नदी अपने आप में ही हमारे देश की एक सांस्कृतिक धरोहर को समेटे हुए है. बनारस के ज्यादातर मंदिर इसी नदी के आस-पास स्थित हैं. बनारस में कुल 88 घाट हैं जो की गंगा नदी के तट पर बसे हैं. देश-विदेश से हमारे श्रद्धालु भक्त और पर्यटक यहां गंगा नदी में स्नान करने आते हैं. 

अस्सी घाट

यह वही घाट है जहां अस्सी नदी और गंगा नदी का संगम है. एक पौराणिक कथा के अनुसार मां दुर्गा ने शुम्भ-निशुम्भ नाम के राक्षस का अपनी तलवार से वध करने के बाद उस तलवार को यहां फेंक दिया था जिसकी वजह से अस्सी नदी की उत्पत्ति हुई है. इसी घाट पर एक पीपल का बहुत बड़ा पेड़ है जिसके नीचे भगवान शिव का शिवलिंग और भगवान अस्सींगमेश्वारा का मंदिर भी है जिसके दर्शन करने के लिए बहुत से श्रद्धालु आते हैं.

मणिकर्णिका घाट

कहा जाता है कि इंसान के मरने के बाद उसका दोबारा जन्म होता है और यह जीवन का जन्म-मृत्यु का चक्र हमेशा चलता रहता है. इसी जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति पाने के लिए आत्मा को मोक्ष मिलना बहुत जरूरी होता है. हिन्दू धर्म में मणिकर्णिका घाट हिन्दुओ के लिए मोक्ष का स्थान है.

मान्यता यह है कि मृत्यु के बाद जिसका शव मणिकर्णिका घाट पर जलाया जाता है उसकी आत्मा को मुक्ति मिल जाती है और उसको जन्म-मृत्यु के चक्र से भी हमेशा के लिए छुटकारा मिल जाता है. इस घाट पर चिता की आग कभी शांत नहीं होती है, हर वक्त किसी न किसी शव का दाह-संस्कार हो रहा होता है.

धमेख स्तूप

धमेख स्तूप वाराणसी के सारनाथ में स्थित है. यह स्तूप सम्राट अशोक के समय में बना था. ऐसा माना जाता है कि डिअर पार्क में स्थित धमेख स्तूप ही वह स्थान हैं जहां महात्मा बुद्ध ने अपने शिष्यों को प्रथम उपदेश दिया था. धमेख स्तूप एक ठोस गोलाकार बुर्ज की तरह दिखता है. इसका व्यास 28.35 मीटर (93 फुट) और ऊँचाई 39.01 मीटर (143 फुट) है.

आपको बता दें कि यहां आने वाले पर्यटकों के लिए कुछ खास नियम बनाए गए हैं जैसे कि स्तूप परिसर में हैं शांत रहना, साथ ही चप्पल या जूते पहन के अंदर नहीं आना, इसके अलावा मोबाइल फोन का इस्तेमाल भी यहां मना किया जाता है. यह भी एक वाराणसी में घूमने की जगह है, जहां आकर आपको हमारे इतिहास के कई पन्ने पलटने का मौका मिलता है.

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दशाश्वमेध घाट

बनारस के गंगा नदी के किनारे बसे हुए घाटों में से एक घाट है दशाश्वमेध घाट, जो कि सबसे पुराना और सबसे सुंदर घाट माना जाता है. दशाश्वमेध का अर्थ होता है दस घोड़ों की बलि. एक मान्यता के अनुसार यहां पर बहुत बड़ा यज्ञ करवाया गया था और उसमे दस घोड़ों की बलि दी गई थी.

वाराणसी के 88 घाटों में से 5 घाट सबसे ज्यादा पवित्र माने गए हैं. ये पांच घाट हैं: अस्सी घाट, दशाश्वमेध घाट, आदिकेशव घाट, पंचगंगा घाट तथा मणिकर्णिका घाट. इन घाटों को सामूहिक रूप से ‘पंचतीर्थ’ कहा जाता है.

Input: Zee News

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